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Complete Hindi Pedagogy Nots For Ctet , Uptet , Tet And All Teachers Exam

 




Complete Hindi Pedagogy Nots For Ctet , Uptet , Tet And All Teachers Exam 


हेलो दोस्तों आज हम आपके लिए लाए हैं। Complete Hindi Pedagogy आज के इस पोस्ट में हम हिंदी पेडागोजी को कवर करने वाले हैं। हिंदी पेडागोजी All Teachers Exam मैं पूछी जाती है। यदि आप किसी भी टीचर एग्जाम की तैयारी कर रहे हैं और यदि आपने हिंदी लैंग्वेज को लिया है तो यह पोस्ट आपके लिए बहुत ही Important होने वाली है। 







 MP जेल प्रहरी परीक्षा 2020 में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न ? 

हिंदी भाषा शिक्षण के उद्देश्य एवं सिद्धांत

भाषा संप्रेषण का सिर्फ एक माध्यम नहीं है, शिक्षक को चाहिए कि वह भाषा के प्रत्येक पहलू पर ध्यान दें चाहे वह सामाजिक पहेलू हो मनोवैज्ञानिक पहलू हो या सौंदर्यात्मक पहलू या सांस्कृतिक पहलू इन सभी पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है.


भाषा शिक्षण के उद्देश्य

सुनने बोलने पढ़ने लिखने को लंबे समय से भाषा शिक्षण के मुख्य उद्देश्य के रूप में मान्यता दी जाती रही है लेकिन यह भाषा शिक्षण का एकमात्र उद्देश्य नहीं है।

 इस प्रक्रिया के साथ संप्रेषण कौशल उच्चारण विविधता और सब प्रशिक्षण पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है।

हमारा उद्देश्य भाषा शिक्षा को समग्रता वादी दृष्टिकोण से विद्यालय शिक्षा का अंग बनाना है जब हम बोल रहे होते हैं तब हम सुन भी रहे होते हैं और जब हम लिख रहे होते हैं तब हम पढ़ भी रहे होते हैं।


भाषा शिक्षण के कुछ महत्वपूर्ण लक्ष्य

1. भाषा को सुनकर समझने की दक्षता का विकास करना।

2. मात्र पढ़ना ना हो बल्कि समाज के साथ पठन की योग्यता का विकास होना चाहिए।

3. भाषा शिक्षण विद्यार्थियों में विभिन्न मुद्दों को समझने और देखने में संवेदनशीलता के दृष्टिकोण के प्रयोग में पारंगत बनाने वाला हो।

4. भाषा शिक्षण विद्यार्थी को अपनी कल्पना और सृजनात्मकता को विकसित करने में सहायता करें।

5. सुसंगत लेखन में पारंगत हो शिक्षार्थी अपने विचारों को सहज और व्यवस्थित ढंग से प्रकट करने की क्षमता का विकास कर पाए वह व्याकरण शब्द ज्ञान विषय विराम चिन्ह इत्यादि के प्रयोग में पारंगत हो।

6. विभिन्न परिस्थितियों में हम सहज रूप से अपने विचारों को तार्किक विश्लेषणात्मक तथा रचनात्मक ढंग से अभिव्यक्त करने में सक्षम बने ।


भाषा शिक्षण के अंतर्गत कुछ ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

1. भाषा शिक्षण में व्याकरण के ज्ञान से अधिक विषय वस्तु पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

2. यदि बच्चों को पर्याप्त अवसर प्रदान किए जाएं तो वह आसानी से भाषा सीख सकता है।

3. मनुष्य में जन्मजात भाषा की क्षमता होती है।

4. बच्चा भाषाई जगत के साथ संपर्क के अतिरिक्त स्वयं की अंतर्निहित भाषाई क्षमता के साथ जन्म लेता है।

5. बच्चा 3 साल या उससे पहले ही अपनी मातृ भाषा की मूल एवं उप तंत्रों से परिचित हो जाता है।

6. भाषा में समाज को अभिव्यक्त करने की क्षमता होती है।

7. सभी भाषाओं में थोड़े बहुत फेरबदल से एक ही लिपि में आसानी से लिखी जा सकती है।

8. भाषा और लिपि के बीच कोई निश्चित संबंध रेखा अंकित नहीं किया जा सकता ।

9. बानी भाषा का स्थाई स्वरूप है इसमें भाषा के लिखित स्वरूप की अपेक्षा बहुत तेजी से बदलाव आते हैं।

10. भाषा के मुख्य रूप से दो स्वरूप है वाणी और लेखन।

11. व्याकरण भाषा के व्यंजन एवं स्वर्गीय ध्वनियों की एक सुनियोजित नियम मध्य क्रम है।


हिंदी भाषा शिक्षण के सामान्य उद्देश्य

  • संप्रेषण कौशल का विकास करना।
  • बच्चे के भाषा के संदर्भ और पूर्व ज्ञान को भाषा पाठ्यक्रम से जोड़ना।
  • संवेदनशीलता गैर शाब्दिक अभिव्यक्ति।
  • सृजनात्मकता को स्थान देना।
  • व्याकरण का विकास करना।
  • अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों का विकास करना।
  • संज्ञानात्मक विकास।


प्राथमिक स्तर में भाषा शिक्षण के प्रमुख उद्देश्य

  1. बच्चों के उच्चारण कौशल पर विशेष ध्यान देना एवं कक्षा में नियमित रूप से उच्चारण का अभ्यास कराने का प्रयास करना।
  2. बच्चों को प्रचलित लोकोक्तियां एवं मुहावरेसे परिचित करवाना एवं उनके उचित प्रयोग करने के लिए प्रेरित करना।
  3. बच्चे की स्वयं पढ़ने की रुचि को प्रोत्साहन देना।
  4. अपने भावों एवं विचारों को स्पष्ट लेखन के माध्यम से अभिव्यक्त करने की कला को विकसित करने का प्रयास करना।
  5. व्याकरण का प्रारंभिक ज्ञान प्रदान करना।
  6. मन में चल रहे विचारों एवं उनसे जुड़े भावों को मौखिक रूप से अभिव्यक्त करने के लिए बच्चे को प्रेरित करना।
  7. बच्चों को भाषा की लिपि से परिचित करवाना एवं उनका नियमित अभ्यास करवाना।
  8. बच्चों में वाचन की क्षमता को प्रोत्साहन देना।
  9. बच्चों में पहले से विद्यमान शब्द भंडार की जांच एवं नए शब्दों के भंडारण में वृद्धि करने का प्रयास करना।
  10. ध्वनियों में भेद करने की कौशल का विकास करने में बच्चे की सहायता करना।


माध्यमिक स्तर पर भाषा शिक्षण के प्रमुख उद्देश्य

  1. बच्चों में हिंदी भाषा के साहित्य के संदर्भ में रुचि पैदा करने के लिए प्रयास करना एवं उसको पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना।
  2. बच्चों को मानक भाषा के संदर्भ में शुद्धता एवं शुद्धता के संबंध में जागरूक करना एवं संदर्भ में नियमित अभ्यास करवाना।
  3. व्याकरण की बारीकियां एवं जटिल भाषा संरचना के संबंध में विद्यार्थियों को बोध कराना एवं इस संबंध में उन्हें संवेदनशील करने का प्रयास करना।
  4. भाषा के संदर्भ में छात्रों में सौंदर्य बोध की क्षमता विकसित करने का प्रयास करना।
  5. बच्चों में अर्थ पूर्ण संवाद करने की क्षमता विकसित करने का प्रयास करना।
  6. साहित्य के संदर्भ में बच्चों में सृजनशीलता पैदा करने का प्रयास करना जिससे वह भी अपने विचारों को स्पर्धा में व्यक्त कर सकें।
  7. बच्चों को प्रचलित लोकोक्तियां एवं मुहावरे से परिचित करवाना एवं उनके उचित प्रयोग करने के लिए प्रेरित करना।
  8. बच्चे की स्वयं पढ़ने की रुचि को प्रोत्साहन देना।
  9. अपने भावों एवं विचारों को स्पष्ट लेखन के माध्यम से अभिव्यक्त करने की कला को विकसित करने का प्रयास करना।
  10. भाषा के प्रति संवेदनशील बनाने का प्रयास करना।
  11. व्याकरण का प्रारंभिक ज्ञान प्रदान करना।
  12. मन में चल रहे विचारों एवं उनसे जुड़े भावों को मौखिक रूप से अभिव्यक्त करने के लिए बच्चे को प्रेरित करना
  13. बच्चों को भाषा की लिपि से परिचित करवाना एवं उनका नियमित अभ्यास करवाना।

भाषा सीखना और ग्रहण करना


भाषा ग्रहण करना

  • भाषा सीखना और ग्रहण करना तो विभिन्न प्रक्रियाएं हैं।
  • भाषा ग्रहण करना एक अमूर्त संकल्पना है।
  • हम प्रमुख रूप से अर्धचेतन अवस्था में भाषा ग्रहण करते हैं।


भाषा सीखना

  • यह प्रक्रिया भाषा सीखने की प्रक्रिया से अधिक मूर्त प्रकृति की है।
  • हम चेतन अवस्था में भाषा सीखते हैं।
  • अक्सर यहां प्रक्रिया विद्यालयों में होती है जब हम किसी भाषा के संबंध में उसके नियम और व्याकरण सीख रहे होते हैं।

भाषा सीखने और ग्रहण करने के प्रमुख सिद्धांत


1.भाषा सीखने का व्यवहारवादी सिद्धांत।
2. भाषा सीखने का देशज सिद्धांत।
3. भाषा सीखने का संज्ञानवादी सिद्धांत।
4. भाषा सीखने का सामाजिक अंतः क्रिया सिद्धांत।

1.भाषा सीखने का व्यवहारवादी सिद्धांत

यहां सिद्धांत प्रमुख रूप से भाषा ग्रहण करने की प्रक्रिया में शब्दों और व्याकरण की भूमिका पर जोर देता है इस सिद्धांत के विकास में इस किन्नर की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

  • भाषा सीखना अनुकरण और पुनर्बलन की प्रक्रिया है।
  • यह बच्चे के दिमाग को खाली स्लेट की तरह देखते हैं।
  • भाषा एक उद्दीपन प्रतिक्रिया है इसको अनुबंधित उद्दीपन की सहायता से सीखा जा सकता है।
  • बच्चा भाषा बोलना आसपास सुनी गई बातचीत का अनुकरण करके सीखता है।
  •  भाषा अभ्यास आधारित है क्योंकि बच्चा इसको बहुत दौरान ने कई बार गलतियां एवं सुधारने के बाद ही सीखता है।
  • स्किनर के अनुसार मौखिक व्यवहार के दो तरीके हैं पहला मौखिक व्यवहार तब पुनरवलित होता है जब बच्चे को पुकारने पर वह वस्तु मिल जाती है।
  • भाषा सीखने को पूर्ण रूप से नियंत्रित किया जा सकता है हम नियंत्रित दशाओं में बदलाव लाकर भाषा सीखने की प्रक्रिया में बदलाव ला सकते हैं।


2. भाषा सीखने का देशज सिद्धांत

यहां सिद्धांत भाषा सीखने के व्यवहार वादी सिद्धांत के विरोध स्वरूप आया है इस सिद्धांत के प्रमुख प्रवर्तक ब्लूमफील्ड और नोम चोमस्की थे इस सिद्धांत की प्रमुख मान्यता है कि हम सभी में भाषा ग्रहण करने की आंतरिक योग्यता होती है।

  • भाषा मौलिक रूप से मानव मस्तिष्क में ही संचालित होती है।
  • हम भाषा को एक बोलने और समझने की योग्यता के रूप में ग्रहण करते हैं।
  • यदि 2 लोग बिल्कुल सामान्य ज्ञान भी रखते हैं तो भी उनकी अभिव्यक्ति की क्षमता में अधिक अंतर देखने को मिल सकता है।
  • नोम चोमस्की की का मानना था कि प्रत्येक बच्चे में एक भाषा ग्रहण करने का यंत्र होता है।

3.भाषा सीखने का संज्ञानवादी सिद्धांत

इस सिद्धांत के प्रवर्तक जीव विज्ञान जीन पियाजे थे इस सिद्धांत में प्याजे ने भाषा ग्रहण करने को बच्चे के मानसिक या संज्ञानात्मक विकास के संदर्भ में ही रखा है ।

  • भाषा की संरचना तभी उत्पन्न हो सकती है जब पहले से ही स्थापित संज्ञानात्मक आधार उपस्थित हो।
  • भाषा सीखने से पहले बच्चे को वैचारिक क्षमता विकसित करनी होगी।
  • भाषा का विकास संज्ञानात्मक विकास का ही परिणाम है।
  • विचार भाषा के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इस सिद्धांत की कुछ सीमाएं हैं जैसे यह सिद्धांत बच्चों में भाषा विकास को उनके संज्ञानात्मक विकास का ही एक पहेली मानकर चलता है जबकि यदि हम कुछ शोधों की मानें तो यह दोनों बिल्कुल अलग प्रक्रियाएं हैं कुछ मामले में पाया गया है कि जिन बच्चों की बौद्धिक विकास किसी वजह से अवरुद्ध हो जाती है बे भी भाषा बोलने में पारंगत हो जाते हैं।

यहां सिद्धांत बच्चे के बौद्धिक विकास में भाषा की भूमिका को भी हतोत्साहित करता है जबकि बच्चे के बौद्धिक विकास में भाषा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


4.भाषा सीखने का सामाजिक अंतः क्रिया सिद्धांत

यह सिद्धांत भाषा ग्रहण करने में भाषा की सामाजिक प्रकृति और अन्य लोगों के साथ अंतः क्रिया पर जोर देता है यह सिद्धांत मानता है कि हम में जन्म के साथ भाषा सीखने की कोई आंतरिक क्षमता नहीं होती है अपितु हम अपने आसपास के लोगों से अंतः क्रिया करके भाषा सीखते हैं।

  • क्रियाशील सामाजिक अंतः क्रिया के बिना भाषा सीखना संभव नहीं है।
  • बच्चों को अपनी मात्री भाषा सीखने के लिए स्थाई और निरंतर अवसर मुहैया कराए जाते हैं।
  • अभिभावक और वयस्क बच्चों को सीखने का वातावरण प्रदान करते हैं।
  • भाषा सीखने में भाषा की रचना और संरचना से अधिक महत्वपूर्ण भाषा संकेतों का प्रयोग है।
  • इस सिद्धांत के विकास में वाइगोत्सकी और ब्रूनर की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।

ब्रूनर का भाषा ग्रहण करने का सहायक यंत्र


यह एक प्रकार से बच्चे को उसके समाज की ओर से सहायता है जिसमें वह अन्य लोगों से अंतः क्रिया करता है।
यह एक प्रकार का सहायता तंत्र है जो भाषा सीखने में बच्चों की सहायता करता है।








राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के अनुसार


  • बच्चे स्वभाविक रूप से सीखने के लिए प्रेरित रहते हैं और उनमें सीखने की क्षमता होती है।
  •  अर्थ निकालना , अमूर्त सोच की क्षमता विकसित करना विवेचना व कार्य अधिगम की प्रक्रिया के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू हैं।
  • बच्चे दूसरों के साथ अन्य क्रिया करके सीखते हैं इसलिए उन्हें सभी प्रकार के अवसर मिलने चाहिए।
  •  बच्चे मानसिक रूप से तैयार हो उससे पहले ही उन्हें पढ़ा देना बाद की अवस्थाओं में उनमें सीखने की प्रवृत्ति को प्रभावित करता है।
  •  सीखना मध्यस्थता के बिना भी हो सकता है प्रत्यक्ष रुप से सीखने से सामाजिक संदर्भ व संवाद विशेषकर अधिक सक्षम लोगों के संवाद विद्यार्थियों को उनके स्वयं के उच्च संज्ञानात्मक स्तर पर कार्य करने का मौका देते हैं।
  • सीखने में विविधता और चुनौतियां होनी चाहिए ताकि वह बच्चों को रोचक लगी और उन्हें व्यस्त रख सके।
  • सीखने की एक गति होनी चाहिए ताकि विद्यार्थी अवधारणाओं को समझ सके और आत्मसात कर सकें।
  • बच्चे स्कूल व घर दोनों जगहों पर सीखते हैं अतः इन दोनों जगहों में सही संबंध रहे तो सीखने की प्रक्रिया पुष्ट होती है।
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