Header Ads Widget

Ticker

6/recent/ticker-posts

Growth & Development | अभिव्रद्धि एवं विकास | Child Psychology | बाल मनोविज्ञान


Growth & Development




Growth & Development | अभिव्रद्धि एवं विकास | Child Psychology | बाल मनोविज्ञान


1. अभिव्रद्धि - वृद्धि से तात्पर्य मानव शरीर और उसके विभिन्न अंगों में होनेेे वाला मात्रात्मक परिवर्तन से है।


जैसे - शरीर की लंबाई का बढ़ना वृद्धि कहलाता है।

परिभाषा - 


श्रीमती हरलॉक के अनुसार बालक के शरीर और उसकी संरचना में होने वाले मात्रात्मक परिवर्तन को ही अभिवृद्धि कहते हैं।

सोरेनसन के अनुसार शरीर और उसके अंगों में होने वाली मात्रात्मक बढ़ोतरी ही अभिवृद्धि कहलाती है।

अभिवृद्धि की विशेषताएं


1. अभिवृद्धि एक संकुचित प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत केवल शरीर की लंबाई को रखा जाता है।

2. अभिवृद्धि एक मात्रा का परिवर्तन है जिसे हम नाप सकते हैं और देख सकते हैं।

3. अभिवृद्धि एक निश्चित समय तक ही होती है अर्थात शरीर की लंबाई 18 से 19 साल तक ही बढ़ती है।

4. अभिवृद्धि की प्रक्रिया क्रमिक होती है अचानक नहीं होती है वृद्धि कोशिकाओं में होने वाली वृद्धि है।

5. अभिवृद्धि की दिशा सिर से पैर की ओर होती है व केंद्र क्षेत्रों की ओर होती है।

6. शरीर की वृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओं में होने वाली वृद्धि से है।

7. आयु में वृद्धि के साथ-साथ शरीर की वृद्धि भी होती है।

Note - जन्म के समय लड़कों की लंबाई लड़कियों की तुलना में अधिक होती है, लड़का 19 इंच और लड़कियां 18 इंच की पैदा होती हैं।

शरीर में 40 क्रोमोसोम होते हैं, व 23 जोड़े होते हैं।

जन्म के समय बालक का भजन 7 पौंड या 350 किलोग्राम होता है।

महिलाओं में XX क्रोमोसोन्स होते हैं, और पुरुषों में XY क्रोमोसोम होते हैं।


2. विकास


विकास एक व्यापक क्रिया है जिसमें मानव के अंदर होने वाले गुणात्मक परिवर्तनों को शामिल किया जाता है, अर्थात विकास वह परिवर्तन है जिसके द्वारा बालकों में नए गुणों और क्षमता का विकास होता है।

श्रीमती हरलॉक के अनुसार क्रमिक परिवर्तनों की श्रंखला ही विकास को दर्शाती है।

विकास की विशेषताएं


1. विकास निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
2. विकास में कार्य क्षमता बढ़ती है।
3. विकास की प्रकृति गुणात्मक होती है।
4. विकास की प्रक्रिया सामान्य से विशिष्ट की ओर होती है।



वृद्धि और विकास में अंतर


1. वृद्धि 1 संकुचित प्रक्रिया है,जबकि विकास एक व्यापक प्रक्रिया है।
2. वृद्धि का संबंध मात्रात्मक परिवर्तन से है जबकि विकास का संबंध गुणात्मक परिवर्तन से है।
3. वृद्धि एक निश्चित समय तक होती है विकास निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
4. वृद्धि विकास का हिस्सा है विकास स्वतंत्र व चहुमुखी होता है।
5. वृद्धि को नापा जा सकता है जबकि विकास को महसूस किया जाता है।
6. सभी सहायक होती है विकास आंतरिक और बहू पक्षी होता है।

बाल विकास के सिद्धांत | विकास के प्रकार



  1. संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत - जीन पियाजे
  2. बौद्धिक विकास का सिद्धांत - जीन पियाजे
  3. नैतिक विकास का सिद्धांत - कोहलवर्ग
  4. सामाजिक विकास का सिद्धांत - बंडूरा वॉल्टन
  5. भाषा विकास का सिद्धांत - नोम चोमस्की
  6. संवेगात्मक विकास की मूल प्रवृत्तियां - गोलमैन
  7. शारीरिक विकास विद्या वृद्धि का सिद्धांत - विलियम मेकडुगल
  8. लैंगिक विकास का सिद्धांत - फ़्राईड
  9. मनोसामाजिक विकास का सिद्धांत - एरिकसन
  10. मनोविश्लेषण विकास का सिद्धांत - सिगमंड फ्रायड
  11. परिपक्वता का सिद्धांत - गैसेल


अभिवृद्धि और विकास के सिद्धांत


1. दिशा का सिद्धांत - मानव के विकास की गति की दिशा सिर से पैर की ओर होती है इसे मस्तिकाधोमुखी विकास या फिर सिफ़ॉलोकोडल कहा जाता है।

मानव के विकास की दिशा वरतालुकार होती है।

जब विकास की दिशा केंद्र से परिधि की ओर होती है तो ऐसे प्रॉक्सिमोडिस्टल कहा जाता है।

प्रॉक्सिमोडिस्टल के अनुसार पहले रीड की हड्डी का निर्माण होता है, फिर भुजाओं की हड्डी का निर्माण होता हैउसके बाद उंगलियों की हड्डियों का निर्माण होता है।

2. निरंतरता का सिद्धांत - मानव शरीर में विकास अचानक नहीं होता निरंतर होता है और विकास की गति एक समान नहीं होती है बल्कि पहले विकास कभी तीव्र होता है कभी धीमी गति से होता है।

किसी अवस्था में विकास तेजी से किसी अवस्था में विकास मंद गति से होता है, विकास निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।

3. व्यक्तिगत भिन्नता का सिद्धांत - व्यक्तिगत भिन्नता का अर्थ है विकास की गति सभी बालकों में एक समान नहीं होती है।

जैसे - कोई बालक छह माह में चलना सीखता है तो कोई बालक 1 साल में

4. सामान्य से विशिष्ट प्रक्रिया का सिद्धांत - बालक में पहले सामान्य योग्यताएं विकसित होती है फिर विशिष्ट योग्यताओं का विकास होता है

5. सहसंबंध का सिद्धांत - बालक का विकास एक पक्षी नहीं होता बल्कि विकास एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। बुद्धि का विकास तेज होने पर सभी विकास तेज होने लगते हैं।

6. अंतः क्रिया का सिद्धांत - वंशानुक्रम का अर्थ है एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचने वाले गुण

    विकास = वंशानुक्रम × वातावरण


7. एक समान प्रतिमान का सिद्धांत - सभी मनुष्यों का विकास एक समान होता है।

अभिवृद्धि और विकास को प्रभावित करने वाले कारक


1. वंशानुक्रम - वंशानुक्रम का अर्थ है एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरण होने वाले गुणों को वंशानुक्रम या अनुवांशिकी कहते हैं।

2. वातावरण - बालक का विकास जिस वातावरण में होता है वह वातावरण बालक के विकास को प्रभावित करता है।

3. जन्म का क्रम - जो बालक पहले जन्म लेते हैं उनकी तुलना में बाद में जन्म लेने वाले बालक का विकास अधिक होता है।

4. लिंग - लड़कियों का विकास लड़कों की तुलना में अधिक होता है।

5. पोषण - जिन बालकों का खानपान अच्छा होता है तो उनका विकास भी तीव्र गति से होता है।

6. स्वास्थ्य - बे पालक जो बीमार रहते हैं उनका विकास मंद गति से होता है।

7. बौद्धिक विकास - जिन बालकों का बौद्धिक विकास तेज होता है उनका विकास हर क्षेत्र में अधिक होता है।

8. आयु - बालक की आयु में वृद्धि के साथ-साथ बालक का विकास भी प्रभावित होता है।

9. अंतः स्रावी ग्रंथियां - बालकों के विकास को ग्रंथियों से निकलने वाले हार्मोन से विकास को प्रभावित करते हैं लंबाई में वृद्धि को प्रभावित करने वाली ग्रंथि थायराइड ग्रंथि है थायराइड ग्रंथि से थायरोक्सिन हार्मोन निकलता है।

10. खेल और व्यायाम - खेल के मैदान में बालक का शारीरिक,मानसिक,संवेगात्मक,नैतिक,सामाजिक विकास होता है।

11. प्रजाति - हर प्रजाति के विकास में विभिन्नता पाई जाती है और बालक का विकास प्रजाति के अनुसार ही होता है।

12. शुद्ध वायु और प्रकाश - बालक को शुद्ध वायु और उचित प्रकाश मिलने पर उसके सभी विकास तीव्र गति से होते हैं।

विकास की विभिन्न अवस्थाएं


1. गर्भावस्था - गर्भावस्था की अवधि 280 दिन होती है और अधिकतम अवधि 330 दिन होती है।

2. शैशवावस्था - जन्म से 6 वर्ष

3. बाल्यावस्था - 6 वर्ष से 12 वर्ष
पूर्व बाल्यावस्था - 3 से 7 वर्ष
उत्तर बाल्यावस्था - 7 से 12 वर्ष

4. किशोरावस्था - 13 से 18 वर्ष

5. प्रौढ़ावस्था - 19 वर्ष से ऊपर


1. गर्भावस्था - गर्भावस्था को तीन भागों में बांटा गया है।

A. डिंबावस्था -   गर्भाधान से 2 सप्ताह तक
B. पिंड अवस्था - 2 सप्ताह से 2 माह तक
C. गर्भस्थ शिशु की अवस्था - 3 माह से 9 माह तक

A. डिंबावस्था - डिंब अवस्था में अंडाणु और शुक्राणु आपस में मिलकर डिंब बनाते हैं और निषेचन से दसवीं दिन यह डिंब गर्भाशय की दीवाल से चिपक जाते हैं और गर्भनाल के विकास के बाद मां से पूछा प्राप्त करते हैं।

शरीर का निर्माण क्रोमोसोम्स से होता है स्त्री व पुरुष में 46 क्रोमोसोम्स होते हैं।

स्त्री में XX क्रोमोसोम्स होते हैं। - लड़की
पुरुष में XY क्रोमोसोम्स होते हैं। - लड़का

लड़का या लड़की का होना पुरुष के क्रोमोसोम्स पर आधारित होता है।

B. पिंड अवस्था - इस अवस्था में मानव अंगों का निर्माण शुरू हो जाता है।  इस अवस्था में हृदय का विकास होता है।

पहले सिर,धड़,हाथ, पैरों का निर्माण होता है।

2 माह के अंत तक पिंड की लंबाई 2 इंच हो जाती है और भ्रूण का वजन 200 ग्राम हो जाता है।

लिंग का पता दो माह के अंत में लगता है।

C. गर्भस्थ शिशु की अवस्था - इस अवस्था में किसी नए अंग का निर्माण नहीं होता बल्कि अंगों का विकास होता है।


2. शैशवावस्था -

सिगमंड फ्रायड के अनुसार बालक को जो बनना होता है वह प्रारंभ के 4 से 5 वर्षों में बन जाता है।

वैलेंटाइन के अनुसार शैशवावस्था सीखने का आदर्श काल है।

बृजेश के अनुसार 2 वर्ष की उम्र तक बालक में सभी संभागों का विकास हो जाता है।

हरलॉक के अनुसार शैशवावस्था एक खतरनाक काल एवं अपीली काल है।

फ्राइड के अनुसार काम अवस्था का विकास सेट और शाम में प्रारंभ हो जाता है।

                     शैशवावस्था की विशेषताएं             

1. शैशवावस्था में भय नामक संवेग सर्वाधिक सक्रिय रहता है।
2. शैशवावस्था में बालक स्व केंद्रित वह आत्म केंद्रित होता है बालक अपनी चीजों को दूसरों को नहीं देना चाहता
3. शैशवावस्था में नैतिकता का अभाव पाया जाता है।
4. शैशवावस्था में क्षणिक संवेग पाया जाता है अर्थात मन के भावों को संवेग के द्वारा व्यक्त  करता है।
5. शैशव अवस्था में बालक पर निर्भर होता है। मतलब दूसरों पर निर्भर होता है।
6. शैशवावस्था में बालक अनुकरण की क्रिया से सीखते हैं।
7. शैशवावस्था में बालक कल्पना की दुनिया में खोया रहता है।
8. शैशवावस्था में बालक का मानसिक और शारीरिक विकास तीव्र गति से होता है।
9. समायोजन का काल शेष अवस्था को कहा जाता है।
10. शैशवावस्था में सीखने की गति तेज होती है।
11. सामाजिकता व नैतिकता का अभाव शैशवावस्था में पाया जाता है।
12. शैशवावस्था में बालक को की प्रवृत्ति अंतर्मुखी होती है।
13. शैशवावस्था में बालक के कार्य मूल प्रवृत्तियां पर आधारित होते हैं।
जैसे -  भूख लगने पर रोना


3. बाल्यावस्था -  यहां बालक के विकास की दूसरी अवस्था होती है।

सिगमंड फ्रायड ने बाल्यावस्था को जीवन का निर्माण निकाल कहा क्योंकि इस अवस्था में बालक की आदतों व्यवहार रुचि इच्छा का निर्धारण होता है।

किल पैट्रिक ने बाल्यावस्था को प्रतिद्वंदात्मक अवस्था कहा। इसका अर्थ है दूसरों से आगे निकलना

रास ने बाल्यावस्था को छदम, मिथ्या का काल कहा है।

कॉल एवं ब्रश ने बाल्यवस्था को जीवन का अनोखा काल है। क्योंकि इस काल में बालक जैसे-जैसे बढ़ता है,उसके व्यवहार में बदलाव आते हैं माता-पिता को उन्हें समझने में कठिनाई होती है।

                  बाल्यावस्था की विशेषताएं            


  1. बाल्यावस्था को गैंग या टोली की अवस्था कहां है।
  2. बाल्यावस्था मैं बालक समूह का सक्रिय सदस्य बन जाता है और समूह में रहना पसंद करता है।
  3. शिक्षा का प्रारंभ 3 साल में हो जाता है।
  4.  बाल्यावस्था में काम की भावना सुषुप्त अवस्था में रहती है।
  5. बाल्यावस्था मैं बालक विषम लिंगी समूह का सदस्य बन जाता है।
  6. इस अवस्था में संग्रह करने की प्रवृत्ति पाई जाती है।
  7. इस काल में बालक बहिर्मुखी होते हैं।
  8. नैतिकता का विकास बाल्यावस्था में प्रारंभ हो जाता है।
  9. किलपैट्रिक के अनुसार सर्वाधिक सामाजिक विकास बाल्यावस्था में होता है।
  10. बाल्यावस्था को स्फूर्ति की अवस्था कहा जाता है।
  11. स्थूल संक्रियात्मक अवस्था बाल्यवस्था को कहा जाता है।
  12. बिना कार्य के भटकने की अवस्था बाल्यावस्था को कहा गया है।
  13. बाल्यावस्था को सृजनशीलता की विकास की अवस्था कहा जाता है।
  14. बाल्यावस्था में जिज्ञासा की प्रवृत्ति पाई जाती है।
  15. मूर्त चिंतन की अवस्था बाल्यावस्था को कहा गया है।
  16. बाल्यावस्था में आत्मनिर्भरता की भावना पाई जाती है।

4. किशोरावस्था - 12 से 18 वर्ष का काल किशोरावस्था कहलाता है।

              किशोरावस्था की विशेषता         

  1. किशोरावस्था में बालक तार्किक और अमूर्त चिंतन करने लगता है।
  2. सर्वाधिक काम प्रवृत्ति की भावना किशोरावस्था में रहती है।
  3. स्टैनले हॉल के अनुसार बालक के शरीर में किशोरावस्था में अचानक परिवर्तन होता है।
  4. हेडी कमेटी के अनुसार 12 वर्ष की अवस्था में बालक की नसों में ज्वार उठना शुरू हो जाता है।
  5. जॉन्स के अनुसार किशोरावस्था शैशवावस्था की पुनरावृति है।
  6. समायोजन का अभाव किशोर अवस्था में पाया जाता है।
  7. किशोरावस्था में संवेगात्मक अस्थिरता पाई जाती है अर्थात विचारों में अस्थिरता पाई जाती है।
  8. 15 साल की उम्र तक लड़कियों का वजन लड़कों की तुलना में से अधिक होता है।
  9. किशोरावस्था में लड़कियों का विकास लड़कों की तुलना में अधिक होता है।
  10. किशोरावस्था में स्वमोह की अवस्था पाई जाती है। अर्थात खूबसूरत देखने की अवस्था
  11. किशोरावस्था में विषम लिंगी के प्रति आकर्षण की भावना का विकास होता है।
  12. रॉस के अनुसार सेवा की भावना का विकास किशोर अवस्था में होता है।
  13. कल्पना की बहुलता किशोर अवस्था में पाई जाती है अर्थात इस अवस्था को द्वार सूखने की अवस्था कहा जाता है।
  14. किशोरावस्था को जीवन का स्वर्ण काल कहा जाता है।
  15. किशोरावस्था को ब्यूटी एज , टीन एज कहा जाता है।
  16. किलपैट्रिक ने किशोरावस्था को जीवन का सबसे कठिन काल कहा है।


Related Articles

 Important Question On Child Development & Pedagogy In Hindi Part-1 

 Thorndike ka sambandh baad ka Siddhant || थार्नडाइक का संबंधवाद का सिद्धांत 

 Growth and Development वृद्धि एवं विकास in Hindi 

 Adhigam Ka Arth Aur Paribhasha- अधिगम का अर्थ और परिभाषाएं 

 पावलॉव का शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धांत और शैक्षिक महत्व (Classical Conditioning Theory) 

 वंशानुक्रम व वातावरण-Heredity & Environment 

 Child Development And Pedagogy In Hindi (Part-1) - Varg 3 , Ctet 

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां