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Ganit Bhasha ki Shikshan vidhiyan-गणित भाषा की शिक्षण विधियां

गणित भाषा की शिक्षण विधियां नोट्स ( Ganit Bhasha ki Shikshan vidhiyan )


गणित भाषा की शिक्षण विधियां
गणित भाषा की शिक्षण विधिया

गणित भाषा की शिक्षण विधिया 


इस पोस्ट में हम आपके लिए गणित भाषा और उसकी शिक्षण विधियां (Ganit Bhasha ki Shikshan vidhiyan )  लेकर आए हैं इस पोस्ट में हमने गणित भाषा की शिक्षण विधियों को विस्तार से समझाया है। इस पोस्ट में गणित भाषा की सभी शिक्षण विधियां जैसे- आगमन विधि, निगमन विधि, व्याख्यान विधि, खोज विधि, प्रयोगशाला विधि, विश्लेषण विधि, संश्लेषण विधि, और गणित शिक्षण की परिभाषाओं को हमने विस्तार से समझाया है। गणित भाषा शिक्षण विधियों से भारत की सभी  TET प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न पूछे जाते हैं। TET परीक्षाओं की दृष्टि से गणित भाषा की शिक्षण विधियां सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक है इस टॉपिक से सभी TET परीक्षाओं में प्रश्न पूछे जाते हैं। यह पोस्ट TET परीक्षा की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं आशा है कि इस टॉपिक से सभी टेट एग्जाम में प्रश्न पूछे जाने की संभावना है हम इस पोस्ट में गणित भाषा और इसकी शिक्षण विधियां का विस्तार से वर्णन करने वाले हैं जो आपको सिर्फ DigitalBasta.in पर ही देखने को मिलेगा. आने वाली सभी परीक्षाओं के लिए हमारी टीम की ओर से धन्यवाद!


गणित एक ऐसा विषय है जिसमें संख्याएं पाई जाती हैं और इन संख्याओं की घटनाओं का विषय होने से गणना शास्त्र कहा जाता है गणित की उत्पत्ति भारत में वैदिक काल से मानी जाती है और वैदिक काल में सबसे पहले भारत देश में एक से लेकर के 9 तक के अंक बने थे इन अंको  को प्राकृत संख्याएं कहते हैं गुप्त काल के अंतिम दिनों में भारत देश के  आर्यभट्ट ने शून्य का आविष्कार किया जिससे संख्याएं जीरो से अनंत तक बनी  इन्हें पूर्ण संख्याएं कहते हैं. गणित का प्रारंभिक ज्ञान भारत से ही दूसरे देशों में पहुंचा जिसे अन्य राष्ट्रों में और अधिक महत्वपूर्ण बनाया

आज की अमेरिकी और यूरोपीय देशों में 0 से 9 तक के अंको को हिंदू अरेबिक संख्याएं कहा जाता है।

गणित की विषय वस्तु जटिल  होने के कारण यहां एक कार्तिक विषय है इसलिए इसकी प्रकृति को आर्थिक एवं जटिल माना  गया है।

गणित में अपने स्वयं के सूत्र चिन्ह संकेत चित्र आरेख आदि पाए जाते हैं जिससे गणित की भाषा का निर्माण होता है और गणित की भाषा सार्वभौमिक होने के साथ ही सर्वाधिक उपयोग में आने वाली भाषा है।

गणित की विषय वस्तु को देखने के लिए किसी विद्यालय में जाने की आवश्यकता नहीं होती यह समाज के बीच में रहते हुए भी गणित की विषय वस्तु को सीखा जा सकता है मनुष्य के जन्म से लेकर मनुष्य की मृत्यु तक गणित का अहम योगदान होता है।

गणित शिक्षण की महत्वपूर्ण परिभाषाए (Important definition of teaching mathematics)


गैलीलियो के अनुसार- गणित परमेश्वर की भाषा है जिसमें उसने संपूर्ण ब्रह्मांड को लिख दिया है।

रोजर बेकन - गणित समस्त विद्वानों का सिंह द्वार एवं कुंजी है।

वेदांग ज्योतिष - जिस प्रकार से मयूर ओं के सिर पर कलंगी और पार्कों की सिर पर मणि शोभायमान है उसी प्रकार से ज्योतिष विद्वानों में गणित शोभायमान है।

जॉन लॉक - गणित एक ऐसी विषय वस्तु है जो बालक के मस्तिष्क में तर्क और चिंतन का विकास करती है।

गणित की उपयोगिता


गणित का ज्ञान वर्तमान समय में हमारी संपूर्ण सभ्यता और संस्कृति में इस प्रकार से समाहित है कि इसके ज्ञान के अभाव में हमारी संपूर्ण व्यवस्था है समाप्त हो सकती है अर्थात गणित अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय है। गणित हमारी सभ्यता संस्कृति का रक्षक है और गणित से किसी राष्ट्र का विकास संभव होता है।

गणित की उपयोगिता के क्षेत्र


1.सामाजिक 2.आर्थिक 3.व्यवसाय 4.शैक्षिक 5.धार्मिक 6.अनुशासन 7.कला 8.सौंदर्य 9.विज्ञान 10.भाषा 11.चिकित्सा 12.मनोरंजन 13.यातायात 14.उद्योग 15.व्यवहार

National Curriculum Framework 2005-राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 For Ctet/Uptet/Kvs
Thorndike ka Sidhant || थार्नडाइक का संबंधनवाद का सिद्धांत ( Theory Of Connectionism )

A.आगमन विधि


गणित शिक्षण की यह प्रारंभिक विधि है जिसके द्वारा एक एक नियम को ध्यान में रखते हुए उदाहरण से नियम की ओर आगे बढ़ा जाता है आगमन विधि में दो मूल पद होते हैं तथा चार सोपान होते हैं।

1.आगमन विधि सरल से कठिन की ओर चलती है।
2.आगमन विधि ज्ञात से अज्ञात की ओर चलती है।
3.आगमन विधि स्थूल से सूक्ष्म की ओर चलती है।
4.आगमन विधि विशिष्ट से सामान्य की ओर चलती है।
5.आगमन विधि विश्लेषण से संश्लेषण की ओर चलती है।

आगमन विधि अंक गणित में सर्वाधिक उपयोगी है आगमन विधि को प्रारंभिक कक्षाओं के बालकों में सरलता पूर्वक गणितीय ज्ञान प्रदान करने के लिए उपयोगी होती है आगमन विधि के द्वारा पहले उदाहरण दिया जाता है उसके बाद नियम की ओर बढ़ा जाता है।

आगमन विधि के गुण

1.आगमन विधि मनोवैज्ञानिक विधि है।
2.आगमन विधि से स्थाई ज्ञान प्रदान होता है।
3.आगमन विधि तर्क और चिंतन का विकास करती है।   4.आगमन विधि में बालक सक्रिय रहता है।

आगमन विधि के दोष

1.आगमन विधि में समय अधिक खर्च होता है।
2.पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं होता।
3.प्रतिभाशाली बालकों में नीरसता पैदा होती है।
4.उच्च कक्षाओं में अधिक उपयोगी नहीं है।

B.निगमन विधि


गणित शिक्षण में यह विधि एक ऐसी विधि है जो प्रारंभिक कक्षाओं से लेकर उच्च कक्षाओं तक विभिन्न प्रकार से उपयोग में आती है परंतु इसका व्यवहार आगमन के ठीक विपरीत होता है और इसमें नियम या सूत्र के माध्यम से आगे बढ़ते हुए समाधान की प्राप्ति या उदाहरण को हल किया जाता है।

1.निगमन विधि कठिन से सरल की ओर बढ़ती है।
2.अज्ञात से ज्ञात की ओर बढ़ती है।
3.सामान्य से विशिष्ट की ओर बढ़ती है।
4.निगमन विधि अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष की ओर आगे बढ़ती है।
5.संश्लेषण से विश्लेषण की ओर
6.सूक्ष्म से स्थूल की और आगे बड़ा जाता है।

निगमन विधि से प्रारंभिक स्तर पर अंकगणितीय समस्याओं का समाधान सामान्य रूप से जबकि कुछ कक्षाओं में विशिष्ट रूप से प्राप्त किया जाता है अर्थात यह उच्च कक्षाओं में अधिक उपयोगी विधि है।

निगमन विधि के गुण

1.निगमन विधि में समय कम लगता है।
2.पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो जाता है।
3.समस्या का समाधान सरलता से प्राप्त हो जाता है। 4.निगमन विधि प्रतिभाशाली बालकों की रुचिकर विधि है।

निगमन विधि के दोष

1.निगमन विधि अमनोवैज्ञानिक विधि है।
2.निगमन विधि केवल उच्च कक्षाओं के बालकों के लिए उपयोगी है।
3.निगमन विधि रखने का दोष पैदा करती है।
4.निगमन विधि में बालक का ज्ञान अस्थाई होता है।


C.व्याख्यान विधि


व्याख्यान विधि के जनक प्लेटो  हैं गणित शिक्षण के दौरान एक शिक्षक व्याख्यान विधि के द्वारा ही विषय वस्तु को स्पष्ट करने का प्रयास करता है तथा वह पाठ से संबंधित मूल इमारत को व्याख्यान विधि से बता सकता है जैसे- औसत पाठ पढ़ाते समय बालक अपने टीचर से पूछता है की सर औसत क्या है। फिर टीचर एक वक्ता के रूप में  थ्योरी को बच्चों के सामने स्पष्ट करता है व्याख्यान विधि में बालक श्रोता होता है और टीचर बक्ता इस विधि से टीचर पूरे पाठ को बालकों के सामने व्याख्या करके स्पष्ट करता है।

व्याख्यान विधि के गुण
1.व्याख्यान विधि में समय व धन कम खर्च होता है।
2.पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो जाता है।
3.बालक में अनुशासन व नियंत्रण पैदा होता है।
4.एक अच्छे श्रोता के गुणों का विकास बालक में होता है।

व्याख्यान विधि के दोष
1.यह एक अमनोवैज्ञानिक विधि है।
2.व्याख्यान विधि में बालक निष्क्रिय रहता है।
3.बालक की जिज्ञासा शांत नहीं हो पाती
4.व्याख्यान विधि प्रारंभिक कक्षाओं के लिए उपयोगी नहीं है।


D.खोज विधि


खोज विधि के जनक हेनरी एडवर्ड आर्म स्ट्रांग है खोज विधि को ह्यूरिस्टिक विधि के नाम से जाना जाता है गणित शिक्षण के दौरान एक शिक्षक को चाहिए कि वह बालकों को कम से कम बताएं और ज्यादा से ज्यादा जानने का प्रयास करें। खोज विधि में सांख्यिकी से संबंधित समस्याओं का समाधान प्राप्त किया जाता है।

खोज विधि के गुण

1.मनोवैज्ञानिक विधि है।
2.खोज विधि से स्थाई ज्ञान प्रदान होता है।
3.खोज विधि से चिंतन और तर्क का विकास होता है।
4.बालक में खोज और अनुसंधान के गुण पैदा करती है।

खोज विधि के दोष

1.समय अधिक लगता है।
2.प्रतिभाशाली बालकों में नीरसता पैदा करती है।
3.कमजोर बालकों के लिए अधिक उपयोगी नहीं है। 4.प्रारंभिक कक्षा के लिए उपयोगी नहीं है।


E.विश्लेषण विधि


गणित शिक्षण के दौरान जब क्षेत्रफल या ज्यामितीय से संबंधित समस्याओं का समाधान प्राप्त करना होता है तो समस्या का विभाजन सिद्धांत के अनुसार टुकड़ों में वर्गीकरण करते हुए समाधान का प्रयास किया जाता है।

विश्लेषण विधि के गुण
1.यह एक मनोवैज्ञानिक विधि है।
2.बालक में तर्क और चिंतन का विकास होता है।

विश्लेषण विधि के दोष

1.समय अधिक खर्च होता है
2.प्रतिभाशाली बालकों में नीरसता पैदा होती है।
3. पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं हो पाता है।

F.संश्लेषण विधि


जब गणित शिक्षण के दौरान किसी समस्या का समाधान प्राप्त करने के लिए विषय वस्तु को संक्षिप्त बनाते हुए या कम से कम समय में निष्कर्षों की प्राप्ति के लिए समस्या के भावों को जोड़ते हुए समाधान का प्रयास किया जाता है तो वह संश्लेषण कहलाता है।

संश्लेषण विधि के गुण

1.पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो जाता है।
2. बालकों में तर्क और चिंतन का विकास होता है।
3. गणितीय समस्या समाधान शीघ्रता से प्राप्त होता है। 4.बालक में आत्मविश्वास पैदा होता है।

संश्लेषण विधि के दोष

1.छोटी कक्षाओं एवं कमजोर बालकों के लिए उपयोग में नहीं है
2. ज्ञान स्थाई नहीं हो पाता है इस वजह से सभी बिंदु नहीं पढ़ाए जा सकते बालक में रटने का दोष पैदा होता है।


G.प्रयोगशाला विधि


जब गणित में त्रिकोणमिति से संबंधित समस्याओं या अन्य घटनाओं को सिद्ध करना होता है तो वह पर प्रयोगशाला विधि का उपयोग किया जाता है। गणित की इस प्रयोगशाला विधि में पैमाना, चांदा ,पेन ,रबड़ ,कैंची जैसी आवश्यक सामग्री की आवश्यकता होती है।

प्रयोगशाला विधि के गुण

1.प्रयोगशाला विधि एक मनोवैज्ञानिक विधि है।
2.बालक में स्थायी ज्ञान प्राप्त होता है।
3.बालक को क्रियाशील लगती है।
4.स्थाई ज्ञान प्राप्त होता है।

प्रयोगशाला विधि के दोष

1.समय व धन अधिक खर्च होता है।
2. विद्यालय में सहायक सामग्री का अभाव हो रहता है 3.बालक का पाठ्यक्रम समय पर नहीं हो पाता

दोस्तो यह टॉपिक बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र में एक महत्वपूर्ण टॉपिक है इस टॉपिक से सभी टेट एग्जाम में प्रश्न पूछे जाते हैं आपको यह टॉपिक पढ़कर कैसा लगा हमें अपना फीडबैक कमेंट बॉक्स में दें।

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