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Thorndike ka Sidhant || थार्नडाइक का संबंधनवाद का सिद्धांत ( Theory Of Connectionism )

थार्नडाइक का संबंधनवाद का सिद्धांत ( Theory Of Connectionism )

नमस्कार दोस्तों थार्नडाइक का सिद्धांत बाल विकास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। थार्नडाइक ने अनुबंधन पर बल दिया है चलिए जानते हैं थार्नडाइक की थ्योरी


थार्नडाईक पहले अमेरिकी पशु मनोवैज्ञानिक थे थार्नडाइक ने पशुओ पर प्रयोग 1898 में करना शुरू किया थार्नडाइक ने कई पशुओ पर प्रयोग जैसे - मुर्गी , मछली , चूहे, किये लेकिन थार्नडाइक का मुख्य प्रयोग 1913  में एक भूखी बिल्ली पर था.थार्नडाइक ने एक भूखी बिल्ली को लिया और उसे पिंजरे में बंद कर दिया बिल्ली भूखी थी.बिल्ली के सामने मास का एक टुकड़ा रख दिया बिल्ली पिंजरे में इधर उधर भागने लगी. लेकिन कई प्रयासों के बाद बिल्ली ने लिबर पर पैर रखा और पिंजरे से बाहर आ गई और मास का टुकड़ा खा लिया ( पिंजरे में एक लिवर लगा हुआ था जिससे पिंजरे का दरवाजा खुलता था ) इसके बाद थार्नडाइक  ने द्वारा बिल्ली को पिंजरे में बंद कर दिया इस बार भी बिल्ली भूखी थी। लेकिन इस बार बिल्ली को दरवाजा खोलने में कम मेहनत करनी पड़ी.और कुछ दिनों के लगातार प्रयास के बाद बिल्ली पिंजरे से बहुत कम समय में बाहर आ जाती।

बिल्ली पर प्रयोग करने के बाद थार्नडाइक इस निष्कर्ष पर पहुंचे की उद्दीपक और अनुक्रिया के बीच एक बंधन बन गया. थार्नडाइक ने कहाँ की उद्दीपक और अनुक्रिया के बीच बंधन होना आवश्यक हे तभी उस उद्देश्य की प्राप्ति होती हे. थार्नडाइक का मानना था की किसी भी कार्य को मानव एक बार में नहीं कर सकता उसे बार -बार प्रयास करते रहना चाहिए।

थार्नडाइक के इस सिद्धांत को हम कई नामो से जानते हे.( We know this principle of Thornedike by many names. )




  1. संबंधनवाद का सिद्धांत ( Theory of relationalism )
  2. प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत ( Principle of effort and error )
  3. प्रयास एवं भूल का सिद्धांत ( Principle of effort and error )
Thorndike ka Sidhant || थार्नडाइक का संबंधनवाद का सिद्धांत ( Theory Of Connectionism )
4.आवर्ती का सिद्धांत ( Recurring principle )
5.S - R  Bonds 
6.उद्दीपक अनुक्रिया का सिद्धांत ( Principle of stimulating response )

थार्नडाइक ने सिखने के 2 नियम दिये 
1 .मुख्य नियम - थार्नडाइक ने सीखने के 3 मुख्य नियम बताए 

  • ततपरता का नियम - व्यक्ति को सीखने के लिये हमेशा तत्पर होना चाहिये। सीखने के लिए उसकी इच्छा होनी चाहिए। वह मानसिक रूप से शारीरिक रूप से सीखने के लिए तैयार होना चाहिए। विद्यार्थी को तैयार करने की जिम्मेदारी अध्यापक की होती है एक अध्यापक ही है जो बालक को मानसिक रूप से तैयार कर सकता है।
एक कहावत कही जाती है की युद्ध के लिए तैयार होना ही युद्ध में आधा विजई मान लिया जाता है।
  • अभ्यास का नियम - किसी भी कार्य को लगातार करते रहना चाहिये अभ्यास ही अविष्कार की जननी हे. हम एक विषय को  लगातार पढ़ते रहे  और दूसरे विषय को एक 2 महीने पढ़कर छोड़ दें  तो हमें पहले पढ़े गए विषय का ध्यान ज्यादा होगा। थार्नडाइक ने अभ्यास के 2 नियम बताये प्रयोग का नियम और अनुप्रयोग का नियम 
  • संतोष और असंतोष का नियम - संतोष असंतोष के नियम को  प्रभाव और परिणाम का नियम भी कहते हैं। यदि किसी व्यक्ति को कोई भी कार्य करने में संतोष की प्राप्ति होती हे तो वः कार्य उसके लिए रूचि पूर्ण हे यदि असंतोस की प्राप्ति होती हे तो बह निराश हो जाता हे 

2. गौण नियम 

थार्नडाइक ने गौण  नियम 5 बताए हैं।


  • बहु प्रतिक्रिया का नियम - व्यक्ति को कोई भी कार्य करने के लिए अनेक प्रतिक्रिया करनी पड़ती है।
  • आत्मीकरण का नियम - इस नियम के अनुसार अपने पूर्व ज्ञान को नए ज्ञान के साथ जुड़ा जाता है।
  • मनोवृति का नियम - इस नियम के अनुसार किसी भी कार्य को करने से पहले हमें उस कार्य के प्रति सकारात्मक भाव से सोचना चाहिए।
  • आंशिक क्रिया का नियम - इस नियम के अनुसार किसी भी कार्य को हमें टुकड़ो में करना चाहिए। इससे वह कार्य सरल व स्वभाविक हो जाता है।
  • साहचर्य का नियम - इस नियम के अनुसार पहले आपने जो कार्य किया है जिस स्थिति में किया है उसी सामान्य स्थिति में दोबारा किसी भी कार्य को करना साहचर्य का नियम कहलाता है।
Note - थार्नडाइक ने सीखने के लिए दो महत्वपूर्ण बातों पर बल दिया।
1. किसी भी कार्य को करने से पहले हमारे अंदर एक प्रेरणा का भाव जागृत होना जरूरी है तभी वह कार्य सफल होगा।
2. जब हम कोई भी कार्य कर रहे हैं तो हमारा उद्देश्य जो हमारा पुनर्बलन है वह हमारे सामने हमें दिखना चाहिए जिससे हम उसे देख कर ज्यादा सख्ती से अपना कार्य कर सकें।

थार्नडाइक के सिद्धांत का शिक्षा के क्षेत्र में क्या उपयोग है।

1. थार्नडाइक का यह सिद्धांत छोटे बच्चे वह मंदबुद्धि वाले बालकों के लिए अत्यंत उपयोगी है क्योंकि हम उनको बार-बार पुनर्बलन देकर यह कार्य बड़ी आसानी से करवा सकते हैं।

2. इस सिद्धांत में अभ्यास पर बल दिया गया है हम किसी भी चीज का जितना ज्यादा अभ्यास करेंगे वह चीज उतनी ही मजबूत हो जाएगी।

3. इस सिद्धांत के द्वारा हम बच्चों को बार-बार गलतियां करने के बाद भी उसे सही रास्ते पर ला सकते हैं।

4. यहां सिद्धांत बालकों को मजबूत बनाता है परिश्रमी बनाता है और उनमें सीखने के नए-नए गुणों का विकास करता है। और बालक आशावादी आत्मनिर्भर बनता है।
5. इस नियम के अनुसार हम छोटे बालकों को उनकी लिखावट को सही कर सकते हैं। छोटे बालकों की बुरी आदतों को छुड़वा सकते हैं। बालकों के अंदर एक प्रतिभा का विकास कर सकते हैं।



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